स्वाधीनता के 75 वर्ष और भविष्य की चुनौतियां

एक बार विदाई दे मां, घूरे आसी, हंसी-हंसी पोरबो फांसी देखबो भारतबासी” and “इंक़लाब ज़िंदाबादजैसे नारे जुबाँ पर आते ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की याद दिला जाती है। भारत का एक ऐसा इतिहास जिसे कभी भुलाया नही जा सकता । स्वाधीनता के 75 वर्ष हो चले लेकिन आज भी ऐसा लगता है कि मानो कुछ समय पहले की बात है । वह एक ऐसा दौर था जब कुछ ऐसे योद्धाओं ने जन्म लिया जिसने भारत माता के आंचल की लाज रख अंग्रेजो की बेड़ियों से आज़ादी दिलायी।

आज़ादी के तुरंत बाद

एक लंबे संघर्ष के बाद हमारा देश आजाद हुआ, लेकिन अंग्रेज़ हमारे देश को एक ऐसे मुहाने पर छोड़ गए थे जहां से अखंड भारत की परिकल्पना करना ही मुश्किल था । आज़ादी के बाद 565 रियासते थी जो अपने आप को स्वतंत्र देश बनाना चाह रही थी इसका सीधा मतलब यह था कि हम तो आज़ाद थे लेकिन हमारी पहचान जिस भूमि से थी उसका ही अस्तित्व न होता। आज के संदर्भ में बात करें तो दिल्ली से हैदराबाद जाने के लिए हमे शायद वीजा जैसे दस्तावेजों की ज़रूरत होती।

परन्तु स्वतन्त्र भारत को एक सूत्र में बांधने का कार्य सरदार पटेल ने किया। अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए सरदार पटेल ने छह सौ छोटी-बड़ी रियासतों का भारत में विलय कराया और भारत की एकता के सूत्रधार कहे जाने लगे। यह स्वतन्त्र भारत की पहली उपलब्धि थी।

डॉ अम्बेडकर ने एक आदर्श देश की परिकल्पना कर नियम एवं शासन प्रणाली को एकजुट कर देश के आगे संविधान को प्रस्तुत किया। चुनाव हुए, नागरिकों को वोट देने का अधिकार मिला और तब से भारत एक सशक्त राष्ट्र और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश बन कर उभरा । भारत के इस सशक्तिकरण में प्रत्येक नागरिक ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है क्योंकि एक बेहतर नागरिक ही स्वस्थ समाज का निर्माण करता है और एक सजग समाज से ही देश की उन्नति होती है । सवाल है कि एक देश और व्यक्ति के रूप में आज हम कहां खड़े हैं, इसका आत्मविश्लेषण करना बेहद जरूरी है।

विविधता में एकता

भारत एक ऐसा देश है जहां विभिन्न संस्कृति, भाषा और धर्म के लोग रहते हैं। यहां अलग अलग जीवन शैली और तरीकों के लोग एक साथ रहते हैं। इन भिन्नताओं के बावजूद हमारे देश मे आपसी सौहार्द और भाईचारा बना हुआ है। यहां की सांस्कृतिक विरासत भी विभिन्न धर्मों के लोगो के कारण ही है । स्वतंत्रता के बाद एक बड़ी परेशानी थी की भारत में बोली जाने वाली विभिन्न भाषाएं और अनेकों प्रकार की संस्कृति के साथ देश को एक सूत्र में कैसे जोड़ा जाएगा लेकिन यहां के लोगों ने विविधिता में एकता की अवधारणा का अनुसरण कर भारत को सुदृढ़ किया।

खेल , शिक्षा और स्वास्थ्य

आज़ादी के 75 साल की यात्रा में , तब से लेकर अबतक, खेल जगत में भारत ने कई बुलंदियों को छुआ। आज़ादी के महज 1 साल बाद पुरुष हॉकी टीम ने ओलिंपिक जीतकर भारत का कद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊंचा किया। कहीं न कहीं भारतीय खेल यहां के लोगों में देशप्रेम की भावना को मजबूत करता है। भारत ने इस 75 साल के यात्रा में कई पदक और कप अपने नाम किये हैं।

खेल के साथ भारत मे शिक्षा के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व क्रांतिकारी परिवर्तन हुए जिससे शिक्षा का क्षेत्र व्यापक ही नही बहुआयामी भी हुआ। प्राचीन समय मे भारत अपने शिक्षा पद्धति के लिए प्रचलित था लेकिन कहतें हैं ना कि वक़्त के साथ परिवर्तन ज़रूरी होता है, हमने परिवर्तन तो किया लेकिन हमारी गति थोड़ी कम थी। शिक्षा मानव के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है अतः भारत के समाज को सुदृढ करने हेतु भारत के संविधान ने शिक्षित समाज बनाने पर जोर दिया है । शिक्षा के क्षेत्र को गतिशील करने के लिए भारत सरकार ने भी कई कदम उठाये जो सराहनीय है।

स्वतंत्रता के इस 75 साल में स्वास्थ्य प्रणाली में भी बड़े परिवर्तन दिखे। आजादी के बाद देश मे सिर्फ 7 हजार सरकारी अस्पताल थे जो अब बढ़कर 26 हजार के आस पास हो गए है। क्या हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की गति देश के आज़ादी से लेकर अबतक सही रही ? यह सोचने वाली बात है । भारत के स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए भारत सरकार ने कई उपाय किये जिसमे आयुष्मान भारत योजना प्रशंसनिय है। आज़ादी के बाद भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सबसे बड़ा घात कोरोना महामारी ने किया, भारत ही नही बल्कि पूरी दुनिया इस महामारी से प्रभावित हुई। । हमने देखा कि भारत सरकार द्वारा किये गए जागरूकता प्रयास जैसे "दो गज की दूरी, मास्क है ज़रूरी " बेहद कारगर साबित हुई। देश ने कोरोना महामारी से लड़ने के लिए टीका ढूंढ निकाला और टीकाकरण अभियान का श्रीगणेश किया।

भारतीय राजनीति

स्वतंत्रता के बाद , 75 साल के यात्रा के दौरान भारतीय राजनीति में कई उतार चढ़ाव देखने को मिले। स्वतंत्रता के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत की सेवा करने का संकल्प लिया। लोग भारत के लोकतांत्रिक व्यवस्था में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे थे। धीरे धीरे भारत का राजनैतिक स्वरूप बदलने लगा । भारत मे अकाल, गरीबी और युद्ध जैसी परिस्थितियों ने जन्म लिया ।

देश के विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं का शुभारंभ हुआ। जय जवान जय किसान के नारे के साथ लाल बहदूर शास्त्री ने देश को संभाला । भारत की आर्थिक स्थिति को ठीक करने के लिए इंदिरा गांधी के द्वारा कई बैंको का राष्ट्रीयकरण किया गया । लेकिन भारत की राजनीति कभी शांत नही रही,निरंतर बदलाव देखने को मिला। कई बड़े आंदोलन हुए, देश को आपातकाल से गुजरना पड़ा। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मुद्दों पर गंभीर मतभेद रहे लेकिन इन मतभेदों ने लोकतंत्र को कमजोर नहीं बल्कि उसे मजबूती ही दी । फिलहाल सरकार के द्वारा कई जनकल्याणकारी नीतियां और योजनाओं का शुभारंभ किया गया है। योजनाओं का लाभ गरीबों एवं कमजोर वर्गों तक पहुंचाया गया है लेकिन यह भी सच्चाई है कि सरकार द्वारा चलाई गई योजनाओं को पूर्ण रूप से लागू नही किया जा सका। फिर भी इनका मुख्य उद्देश्य जनहित ही है।

समस्याएं और भविष्य की चुनौतियां

इस 75 वर्ष के दौरान देश ने कई कठिनाइयों का सामना किया । अकाल, युद्व, आंतरिक कलह इत्यादी जैसे अनेको समस्याओं के साथ हमारा भारत संघर्ष करता रहा है लेकिन वर्तमान समय में सबसे बड़ी समस्या यहां की बढ़ती आबादी है । स्वाधीनता के 75 वर्ष की यात्रा में हम 36 करोड़ से 140 करोड़ हो गये लेकिन क्या हमारे पास संसाधनों में बढ़ोतरी हुई? क्या इतनी बड़ी आबादी के पास खाने के लिए आहार और रहने के लिए घर है? क्या हमारे देशवाशियों को उचित शिक्षा मिल पा रही है ? क्या हमारे पास रोजगार के साधन उप्लब्ध है ?

ऐसी तमाम समस्याओं का मुख्य कारण अनियंत्रित जनसंख्या में वृद्धि है। यूँ तो हमारा देश युवाओं का देश है लेकिन हमारे देश के युवा बेरोजगार हैं क्योंकी हमारे पास पर्याप्त रोजगार के साधन नही है। बेरोजगारी का सीधा संबंध गरीबी से है और गरीबी ही हिंसा को जन्म देती है। अतः जनसंख्या में नियंत्रण देश को कई ऐसी समस्याओं से छुटकारा दिला सकता है जो देश के विकास को बाधित कर रहा है। लेकिन, क्या जनसंख्या में नियंत्रण होने से वर्तमान की स्थिति बदल पाएगी ? नहीं, हम वर्तमान के हालात को नही सुधार सकते हैं । इसके लिए ज़रूरी है कि हम तकनीक का बढ़ चढ़कर उपयोग करें, समाज को शिक्षित करें, स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त करें, रोजगार के नए साधन की खोज करें और यह तभी संभव है जब देश का युवा अपनी जिम्मेदारियों को समझेगा, वर्तमान हालात को समझेगा ।

बढ़ती जनसंख्या , भारत की सबसे बड़ी चुनौती है । अनियंत्रित आबादी के साथ हमारी देश की एक चुनौती अपनी सभ्यता, संस्कृति और भाषा की रक्षा करना है। यहां कई सभ्यताओं का जन्म हुआ, विकास हुआ और बहुत सारी सभ्यताएं विलुप्त भी हो गयी। वर्तमान समय में पश्चिमी सभ्यताओं के बोलबाला के कारण हमारे देश के युवा अपने पौराणिक संस्कृति और सभ्यता को भूलने लगे हैं । आज के युवा भारत के इतिहास, यहां की भाषा और संस्कृति के बारे में जानने की इक्षा नही रखते हैं जबकि हमारा इतिहास, हमारी संस्कृति हमे जीना सिखाती है । वर्तमान से लेकर भविष्य तक यह भारत की बड़ी चुनौतियों में से एक है अतः यह हमारी जिम्मेदारी है कि कभी न खत्म होने वाली सोच के साथ हम अपने देश को एक नए आयाम तक पहुँचा सकें।

निष्कर्ष

स्वाधीनता के 75 वर्ष के दौरान हमारे देश ने कई बुलंदियों को छुआ साथ ही साथ बहुत कुछ खोया भी । समस्याएं व चुनौतियां ज़िन्दगी का एक हिस्सा है, जिसे हम अपनी सूझ बूझ से सुलझा पातें हैं । हम उस धरती को समर्पित हैं जिसका इतिहास प्राचीन समय से ही गौरवशाली रहा है । भारी समस्यओं के बाद भी हमारा देश अडिग रहा है और इसकी यही पहचान हमे जल,थल और नभ में शक्तिशाली बनाती है। हम भारत के लोग आशावादी होतें हैं अतः हमें विश्वास है कि हम उचित कदम उठाकर भारत को एक महान देश के रूप में अडिग रखेंगे।

"जय हिंद"

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